विशेष रिपोर्ट :- पूर्ण संत की पहचान — जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपालजी महाराज

विशेष रिपोर्ट :- पूर्ण संत की पहचान — जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपालजी महाराज

पूर्ण संत की पहचान — संत रामपाल  जी महाराज


वेदों, गीता जी आदि पवित्रा सद्ग्रंथों में प्रमाण मिलता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है व अधर्म की वृद्धि होती है तथा वर्तमान के नकली संत, महंत व गुरुओं द्वारा भक्ति मार्ग के स्वरूप को बिगाड़ दिया गया होता है। फिर परमेश्वर स्वयं आकर या अपने परमज्ञानी संत को भेज कर सच्चे ज्ञान के द्वारा धर्म की पुनः स्थापना करता है। वह भक्ति मार्ग को शास्त्रों के अनुसार समझाता है। उसकी पहचान होती है कि वर्तमान के धर्म गुरु उसके विरोध में खड़े होकर राजा व प्रजा को गुमराह करके उसके ऊपर अत्याचार करवाते हैं। कबीर साहेब जी अपनी वाणी में कहते हैं कि-
जो मम संत सत उपदेश दृढ़ावै (बतावै), वाके संग सभि राड़ बढ़ावै। या सब संत महंतन की करणी, धर्मदास मैं तो से वर्णी।।
कबीर साहेब अपने प्रिय शिष्य धर्मदास को इस वाणी में ये समझा रहे हैं कि जो मेरा संत सत भक्ति मार्ग को बताएगा उसके साथ सभी संत व महंत झगड़ा करेंगे। ये उसकी पहचान होगी। दूसरी पहचान वह संत सभी धर्म ग्रंथों का पूर्ण जानकार होता है। प्रमाण सतगुरु गरीबदास जी की वाणी में –
”सतगुरु के लक्षण कहूं, मधूरे बैन विनोद। चार वेद षट शास्त्रा, कहै अठारा बोध।।“ सतगुरु गरीबदास जी महाराज अपनी वाणी में पूर्ण संत की पहचान बता रहे हैं कि वह चारों वेदों, छः शास्त्रों, अठारह पुराणों आदि सभी ग्रंथों का पूर्ण जानकार होगा अर्थात् उनका सार निकाल कर बताएगा। यजुर्वेद अध्याय 19 मंत्रा 25ए 26 में लिखा है कि वेदों के अधूरे वाक्यों अर्थात् सांकेतिक शब्दों व एक चैथाई श्लोकों को पुरा करके विस्तार से बताएगा व तीन समय की पूजा बताएगा। सुबह पूर्ण परमात्मा की पूजा, दोपहर को विश्व के देवताओं का सत्कार व संध्या आरती अलग से बताएगा वह जगत का उपकारक संत होता है।
यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्रा 25
सन्धिछेदः- अर्द्ध ऋचैः उक्थानाम् रूपम् पदैः आप्नोति निविदः।
प्रणवैः शस्त्राणाम् रूपम् पयसा सोमः आप्यते।(25)
अनुवादः- जो सन्त (अर्द्ध ऋचैः) वेदों के अर्द्ध वाक्यों अर्थात् सांकेतिक शब्दों को पूर्ण करके (निविदः) आपूत्र्ति करता है (पदैः) श्लोक के चैथे भागों को अर्थात् आंशिक वाक्यों को (उक्थानम्) स्तोत्रों के (रूपम्) रूप में (आप्नोति) प्राप्त करता है अर्थात् आंशिक विवरण को पूर्ण रूप से समझता और समझाता है (शस्त्राणाम्) जैसे शस्त्रों को चलाना जानने वाला उन्हें (रूपम्) पूर्ण रूप से प्रयोग करता है एैसे पूर्ण सन्त (प्रणवैः) औंकारों अर्थात् ओम्-तत्-सत् मन्त्रों को पूर्ण रूप से समझ व समझा कर (पयसा) दध-पानी छानता है अर्थात् पानी रहित दूध जैसा तत्व ज्ञान प्रदान करता है जिससे (सोमः) अमर पुरूष अर्थात् अविनाशी परमात्मा को (आप्यते) प्राप्त करता है। वह पूर्ण सन्त वेद को जानने वाला कहा जाता है। भावार्थः- तत्वदर्शी सन्त वह होता है जो वेदों के सांकेतिक शब्दों को पूर्ण विस्तार से वर्णन करता है जिससे पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति होती है वह वेद के जानने वाला कहा जाता है।
यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्रा 26
सन्धिछेद:- अश्विभ्याम् प्रातः सवनम् इन्द्रेण ऐन्द्रम् माध्यन्दिनम् वैश्वदैवम् सरस्वत्या तृतीयम् आप्तम् सवनम् (26)
अनुवाद:- वह पूर्ण सन्त तीन समय की साधना बताता है। (अश्विभ्याम्) सूर्य के उदय-अस्त से बने एक दिन के आधार से (इन्द्रेण) प्रथम श्रेष्ठता से सर्व देवों के मालिक पूर्ण परमात्मा की (प्रातः सवनम्) पूजा तो प्रातः काल करने को कहता है जो (ऐन्द्रम्) पूर्ण परमात्मा के लिए होती है। दूसरी (माध्यन्दिनम्) दिन के मध्य में करने को कहता है जो (वैश्वदैवम्) सर्व देवताओं के सत्कार के सम्बधित (सरस्वत्या) अमृतवाणी द्वारा साधना करने को कहता है तथा (तृतीयम्) तीसरी (सवनम्) पूजा शाम को (आप्तम्) प्राप्त करता है अर्थात् जो तीनों समय की साधना भिन्न-2 करने को कहता है वह जगत् का उपकारक सन्त है।

भावार्थः- जिस पूर्ण सन्त के विषय में मन्त्रा 25 में कहा है वह दिन में 3 तीन बार (प्रातः दिन के मध्य-तथा शाम को) साधना करने को कहता है। सुबह तो पूर्ण परमात्मा की पूजा मध्याõ को सर्व देवताओं को सत्कार के लिए तथा शाम को संध्या आरती आदि को अमृत वाणी के द्वारा करने को कहता है वह सर्व संसार का उपकार करने वाला होता है।

यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्रा 30
सन्धिछेदः- व्रतेन दीक्षाम् आप्नोति दीक्षया आप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धाम् आप्नोति श्रद्धया सत्यम् आप्यते (30)
अनुवादः- (व्रतेन) दुव्र्यसनों का व्रत रखने से अर्थात् भांग, शराब, मांस तथा तम्बाखु आदि के सेवन से संयम रखने वाला साधक (दीक्षाम्) पूर्ण सन्त से दीक्षा को (आप्नोति) प्राप्त होता है अर्थात् वह पूर्ण सन्त का शिष्य बनता है (दीक्षया) पूर्ण सन्त दीक्षित शिष्य से (दक्षिणाम्) दान को (आप्नोति) प्राप्त होता है अर्थात् सन्त उसी से दक्षिणा लेता है जो उस से नाम ले लेता है। इसी प्रकार विधिवत् (दक्षिणा) गुरूदेव द्वारा बताए अनुसार जो दान-दक्षिणा से धर्म करता है उस से (श्रद्धाम्) श्रद्धा को (आप्नोति) प्राप्त होता है (श्रद्धया) श्रद्धा से भक्ति करने से (सत्यम्) सदा रहने वाले सुख व परमात्मा अर्थात् अविनाशी परमात्मा को (आप्यते) प्राप्त होता है।

भावार्थ:- पूर्ण सन्त उसी व्यक्ति को शिष्य बनाता है जो सदाचारी रहे। अभक्ष्य पदार्थों का सेवन व नशीली वस्तुओं का सेवन न करने का आश्वासन देता है। पूर्ण सन्त उसी से दान ग्रहण करता है जो उसका शिष्य बन जाता है फिर गुरू देव से दीक्षा प्राप्त करके फिर दान दक्षिणा करता है उस से श्रद्धा बढ़ती है। श्रद्धा से सत्य भक्ति करने से अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति होती है अर्थात् पूर्ण मोक्ष होता है। पूर्ण संत भिक्षा व चंदा मांगता नहीं फिरेगा।

कबीर, गुरू बिन माला फेरते गुरू बिन देते दान।
गुरू बिन दोनों निष्फल है पूछो वेद पुराण।।
तीसरी पहचान तीन प्रकार के मंत्रों (नाम) को तीन बार में उपदेश करेगा जिसका वर्णन कबीर सागर ग्रंथ पृष्ठ नं. 265 बोध सागर में मिलता है व गीता जी के अध्याय नं. 17 श्लोक 23 व सामवेद संख्या नं. 822 में मिलता है।
कबीर सागर में अमर मूल बोध सागर पृष्ठ 265 –
तब कबीर अस कहेवे लीन्हा, ज्ञानभेद सकल कह दीन्हा।।
धर्मदास मैं कहो बिचारी, जिहिते निबहै सब संसारी।।
प्रथमहि शिष्य होय जो आई, ता कहैं पान देहु तुम भाई।।1।।
जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना, ता कहैं कहु शब्द प्रवाना।।2।।
शब्द मांहि जब निश्चय आवै, ता कहैं ज्ञान अगाध सुनावै।।3।।
दोबारा फिर समझाया है –
बालक सम जाकर है ज्ञाना। तासों कहहू वचन प्रवाना।।1।।
जा को सूक्ष्म ज्ञान है भाई। ता को स्मरन देहु लखाई।।2।।
ज्ञान गम्य जा को पुनि होई। सार शब्द जा को कह सोई।।3।।
जा को होए दिव्य ज्ञान परवेशा, ताको कहे तत्व ज्ञान उपदेशा।।4।।
उपरोक्त वाणी से स्पष्ट है कि कड़िहार गुरु (पूर्ण संत) तीन स्थिति में सार नाम तक प्रदान करता है तथा चैथी स्थिति में सार शब्द प्रदान करना होता है। क्योंकि कबीर सागर में तो प्रमाण बाद में देखा था परंतु उपदेश विधि पहले ही पूज्य दादा गुरुदेव तथा परमेश्वर कबीर साहेब जी ने हमारे पूज्य गुरुदेव को प्रदान कर दी थी जो हमारे को शुरु से ही तीन बार में नामदान की दीक्षा करते आ रहे हैं।
हमारे गुरुदेव रामपाल जी महाराज प्रथम बार में श्री गणेश जी, श्री ब्रह्मा सावित्री जी, श्री लक्ष्मी विष्णु जी, श्री शंकर पार्वती जी व माता शेरांवाली का नाम जाप देते हैं। जिनका वास हमारे मानव शरीर में बने चक्रों में होता है। मूलाधार चक्र में श्री गणेश जी का वास, स्वाद चक्र में ब्रह्मा सावित्री जी का वास, नाभि चक्र में लक्ष्मी विष्णु जी का वास, हृदय चक्र में शंकर पार्वती जी का वास, कंठ चक्र में शेरांवाली माता का वास है और इन सब देवी-देवताओं के आदि अनादि नाम मंत्रा होते हैं जिनका वर्तमान में गुरुओं को ज्ञान नहीं है। इन मंत्रों के जाप से ये पांचों चक्र खुल जाते हैं। इन चक्रों के खुलने के बाद मानव भक्ति करने के लायक बनता है। सतगुरु गरीबदास जी अपनी वाणी में प्रमाण देते हैं कि:–
पांच नाम गुझ गायत्री आत्म तत्व जगाओ। ¬ किलियं हरियम् श्रीयम् सोहं ध्याओ।।
भावार्थ: पांच नाम जो गुझ गायत्राी है। इनका जाप करक े आत्मा का े जागृत करा।े दूसरी बार में दो अक्षर का जाप देते हैं जिनमें एक ओम् और दूसरा तत् (जो कि गुप्त है उपदेशी को बताया जाता है) जिनको स्वांस के साथ जाप किया जाता है।
तीसरी बार में सारनाम देते हैं जो कि पूर्ण रूप से गुप्त है।

तीन बार में नाम जाप का प्रमाण:–

अध्याय 17 का श्लोक 23
¬, तत्, सत्, इति, निर्देशः, ब्रह्मणः, त्रिविधः, स्मृतः,
ब्राह्मणाः, तेन, वेदाः, च, यज्ञाः, च, विहिताः, पुरा।।23।।
अनुवाद: (¬) ब्रह्म का(तत्) यह सांकेतिक मंत्रा परब्रह्म का (सत्) पूर्णब्रह्म का (इति) ऐसे यह (त्रिविधः) तीन प्रकार के (ब्रह्मणः) पूर्ण परमात्मा के नाम सुमरण का (निर्देशः) संकेत (स्मृतः) कहा है (च) और (पुरा) सृष्टिके आदिकालमें (ब्राह्मणाः) विद्वानों ने बताया कि (तेन) उसी पूर्ण परमात्मा ने (वेदाः) वेद (च) तथा (यज्ञाः) यज्ञादि (विहिताः) रचे।
संख्या न. 822 सामवेद उतार्चिक अध्याय 3 खण्ड न. 5 श्लोक न. 8(संत रामपाल दास द्वारा भाषा-भाष्य)ः-
मनीषिभिः पवते पूव्र्यः कविर्नृभिर्यतः परि कोशां असिष्यदत्।
त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरन्निन्द्रस्य वायुं सख्याय वर्धयन्।।8।।
मनीषिभिः पवते पूव्र्यः कविर् नृभिः यतः परि कोशान् असिष्यदत् त्रि तस्य नाम जनयन् मधु क्षरनः न इन्द्रस्य वायुम् सख्याय वर्धयन्।
शब्दार्थ (पूव्र्यः) सनातन अर्थात् अविनाशी (कविर नृभिः) कबीर परमेश्वर मानव रूप धारण करके अर्थात् गुरु रूप में प्रकट होकर (मनीषिभिः) हृदय से चाहने वाले श्रद्धा से भक्ति करने वाले भक्तात्मा को (त्रि) तीन (नाम) मन्त्रा अर्थात् नाम उपदेश देकर (पवते) पवित्रा करके (जनयन्) जन्म व (क्षरनः) मृत्यु से (न) रहित करता है तथा (तस्य) उसके (वायुम्) प्राण अर्थात् जीवन-स्वांसों को जो संस्कारवश गिनती के डाले हुए होते हैं को (कोशान्) अपने भण्डार से (सख्याय) मित्राता के आधार से(परि) पूर्ण रूप से (वर्धयन्) बढ़ाता है। (यतः) जिस कारण से (इन्द्रस्य) परमेश्वर के (मधु) वास्तविक आनन्द को (असिष्यदत्) अपने आशीर्वाद प्रसाद से प्राप्त करवाता है।

भावार्थ:- इस मन्त्रा में स्पष्ट किया है कि पूर्ण परमात्मा कविर अर्थात् कबीर मानव शरीर में गुरु रूप में प्रकट होकर प्रभु प्रेमीयों को तीन नाम का जाप देकर सत्य भक्ति कराता है तथा उस मित्रा भक्त को पवित्राकरके अपने आर्शिवाद से पूर्ण परमात्मा प्राप्ति करके पूर्ण सुख प्राप्त कराता है। साधक की आयु बढाता है। यही प्रमाण गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में है कि ओम्-तत्-सत् इति निर्देशः ब्रह्मणः त्रिविद्य स्मृतः भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करने का ¬ (1) तत् (2) सत् (3) यह मन्त्रा जाप स्मरण करने का निर्देश है। इस नाम को तत्वदर्शी संत से प्राप्त करो। तत्वदर्शी संत के विषय में गीता अध्याय 4 श्लोक नं. 34 में कहा है तथा गीता अध्याय नं. 15 श्लोक नं. 1 व 4 में तत्वदर्शी सन्त की पहचान बताई तथा कहा है कि तत्वदर्शी सन्त से तत्वज्ञान जानकर उसके पश्चात् उस परमपद परमेश्वर की खोज करनी चाहिए। जहां जाने के पश्चात् साधक लौट कर संसार में नहीं आते अर्थात् पूर्ण मुक्त हो जाते हैं। उसी पूर्ण परमात्मा से संसार की रचना हुई है।

विशेष:- उपरोक्त विवरण से स्पष्ट हुआ कि पवित्रा चारों वेद भी साक्षी हैं कि पूर्ण परमात्मा ही पूजा के योग्य है, उसका वास्तविक नाम कविर्देव(कबीर परमेश्वर) है तथा तीन मंत्रा के नाम का जाप करने से ही पूर्ण मोक्ष होता है।
धर्मदास जी को तो परमश्ेवर कबीर साहेब जी ने सार शब्द देने से मना कर दिया था तथा कहा था कि यदि सार शब्द किसी काल के दूत के हाथ पड़ गया तो बिचली पीढ़ी वाले हंस पार नहीं हो पाऐंगे। जैसे कलयुग के प्रारम्भ में प्रथम पीढ़ी वाले भक्त अशिक्षित थे तथा कलयुग के अंत में अंतिम पीढ़ी वाले भक्त कृतघनी हो जाऐंगे तथा अब वर्तमान में सन् 1947 से भारत स्वतंत्रा होने के पश्चात् बिचली पीढ़ी प्रारम्भ हुई है। सन् 1951 में सतगुरु रामपाल जी महाराज को भेजा है। अब सर्व भक्तजन शिक्षित हैं। शास्त्रा अपने पास विद्यमान हैं। अब यह सत मार्ग सत साधना पूरे संसार में फैलेगा तथा नकली गुरु तथा संत, महंत छुपते फिरेंगे।
इसलिए कबीर सागर, जीव धर्म बोध, बोध सागर, पृष्ठ 1937 पर:-
धर्मदास तोहि लाख दुहाई, सार शब्द कहीं बाहर नहीं जाई।
सार शब्द बाहर जो परि है, बिचली पीढ़ी हंस नहीं तरि है।
पुस्तक “धनी धर्मदास जीवन दर्शन एवं वंश परिचय” के पृष्ठ 46 पर लिखा है कि ग्यारहवीं पीढ़ी को गद्दी नहीं मिली। जिस महंत जी का नाम “धीरज नाम साहब” कवर्धा में रहता था। उसके बाद बारहवां महंत उग्र नाम साहेब ने दामाखेड़ा में गद्दी की स्थापना की तथा स्वयं ही महंत बन बैठा। इससे पहले दामाखेड़ा में गद्दी नहीं थी। इससे स्पष्ट है कि पूरे विश्व में सतगुरु रामपाल जी महाराज के अतिरिक्त वास्तविक भक्ति मार्ग नहीं है। सर्व प्रभु प्रेमी श्रद्धालुओं से प्रार्थना है कि प्रभु का भेजा हुआ दास जान कर अपना कल्याण करवाऐं।
यह संसार समझदा नाहीं, कहन्दा श्याम दोपहरे नूं। गरीबदास यह वक्त जात है, रोवोगे इस पहरे नूं।। बारहवें पंथ (गरीबदास पंथ बारहवां पंथ लिखा है कबीर सागर, कबीर चरित्रा बोध पृष्ठ 1870 पर) के विषय में कबीर सागर कबीर वाणी पृष्ठ नं. 136.137 पर वाणी लिखी है कि:-
सम्वत् सत्रासै पचहत्तर होई, तादिन प्रेम प्रकटें जग सोई।
साखी हमारी ले जीव समझावै, असंख्य जन्म ठौर नहीं पावै।
बारवें पंथ प्रगट ह्नै बानी, शब्द हमारे की निर्णय ठानी।
अस्थिर घर का मरम न पावैं, ये बारा पंथ हमही को ध्यावैं।
बारवें पंथ हम ही चलि आवैं, सब पंथ मेटि एक ही पंथ चलावें।
धर्मदास मोरी लाख दोहाई, सार शब्द बाहर नहीं जाई।
सार शब्द बाहर जो परही, बिचली पीढी हंस नहीं तरहीं।
तेतिस अर्ब ज्ञान हम भाखा, सार शब्द गुप्त हम राखा।
मूल ज्ञान तब तक छुपाई, जब लग द्वादश पंथ मिट जाई।
यहां पर साहेब कबीर जी अपने शिष्य धर्मदास जी को समझाते हैं कि संवत् 1775 में मेरे ज्ञान का प्रचार होगा जो बारहवां पंथ होगा। बारहवें पंथ में हमारी वाणी प्रकट होगी लेकिन सही भक्ति मार्ग नहीं होगा। फिर बारहवें पंथ में हम ही चल कर आएगें और सभी पंथ मिटा कर केवल एक पंथ चलाएंगे। लेकिन धर्मदास तुझे लाख सौगंध है कि यह सार शब्द किसी कुपात्रा को मत दे देना नहीं तो बिचली पीढ़ी के हंस पार नहीं हो सकेंगे। इसलिए जब तक बारह पंथ मिटा कर एक पंथ नहीं चलेगा तब तक मैं यह मूल ज्ञान छिपा कर रखूंगा।

संत गरीबदास जी महाराज की वाणी में नाम का महत्व:–

नाम अभैपद ऊंचा संतों, नाम अभैपद ऊंचा। राम दुहाई साच कहत हूं, सतगुरु से पूछा।।
कहै कबीर पुरुष बरियामं, गरीबदास एक नौका नामं।।
नाम निरंजन नीका संतों, नाम निरंजन नीका।
तीर्थ व्रत थोथरे लागे, जप तप संजम फीका।।
गज तुरक पालकी अर्था, नाम बिना सब दानं व्यर्था।
कबीर, नाम गहे सो संत सुजाना, नाम बिना जग उरझाना।
ताहि ना जाने ये संसारा, नाम बिना सब जम के चारा।।

संत नानक साहेब जी की वाणी में नाम का महत्व:–

नानक नाम चढ़दी कलां, तेरे भाणे सबदा भला।
नानक दुःखिया सब संसार, सुखिया सोय नाम आधार।।
जाप ताप ज्ञान सब ध्यान, षट शास्त्रा सिमरत व्याखान।
जोग अभ्यास कर्म धर्म सब क्रिया, सगल त्यागवण मध्य फिरिया।
अनेक प्रकार किए बहुत यत्ना, दान पूण्य होमै बहु रत्ना।
शीश कटाये होमै कर राति, व्रत नेम करे बहु भांति।।
नहीं तुल्य राम नाम विचार, नानक गुरुमुख नाम जपिये एक बार।।

(परम पूज्य कबीर साहेब(कविर् देव) की अमृतवाणी)

संतो शब्दई शब्द बखाना।।टेक।।
शब्द फांस फँसा सब कोई शब्द नहीं पहचाना।।
प्रथमहिं ब्रह्म स्वं इच्छा ते पाँचै शब्द उचारा। सोहं, निरंजन, रंरकार, शक्ति और ओंकारा।।
पाँचै तत्व प्रकृति तीनों गुण उपजाया। लोक द्वीप चारों खान चैरासी लख बनाया।।
शब्दइ काल कलंदर कहिये शब्दइ भर्म भुलाया।। पाँच शब्द की आशा में सर्वस मूल गंवाया।।
शब्दइ ब्रह्म प्रकाश मेंट के बैठे मूंदे द्वारा। शब्दइ निरगुण शब्दइ सरगुण शब्दइ वेद पुकारा।।
शुद्ध ब्रह्म काया के भीतर बैठ करे स्थाना। ज्ञानी योगी पंडित औ सिद्ध शब्द में उरझाना।।
पाँचइ शब्द पाँच हैं मुद्रा काया बीच ठिकाना। जो जिहसंक आराधन करता सो तिहि करत बखाना।।
शब्द निरंजन चांचरी मुद्रा है नैनन के माँही। ताको जाने गोरख योगी महा तेज तप माँही।।
शब्द ओंकार भूचरी मुद्रा त्रिकुटी है स्थाना। व्यास देव ताहि पहिचाना चांद सूर्य तिहि जाना।।
सोहं शब्द अगोचरी मुद्रा भंवर गुफा स्थाना। शुकदेव मुनी ताहि पहिचाना सुन अनहद को काना।।
शब्द रंरकार खेचरी मुद्रा दसवें द्वार ठिकाना। ब्रह्मा विष्णु महेश आदि लो रंरकार पहिचाना।।
शक्ति शब्द ध्यान उनमुनी मुद्रा बसे आकाश सनेही। झिलमिल झिलमिल जोत दिखावे जाने जनक विदेही।।
पाँच शब्द पाँच हैं मुद्रा सो निश्चय कर जाना। आगे पुरुष पुरान निःअक्षर तिनकी खबर न जाना।।
नौ नाथ चैरासी सिद्धि लो पाँच शब्द में अटके। मुद्रा साध रहे घट भीतर फिर ओंधे मख्ुा लटके।।
पाँच शब्द पाँच है मुद्रा लोक द्वीप यमजाला। कहैं कबीर अक्षर के आगे निःअक्षर का उजियाला।।
जैसा कि इस शब्द ‘‘संतो शब्दई शब्द बखाना‘‘ में लिखा है कि सभी संत जन शब्द (नाम) की महिमा सुनाते हैं। पूर्णब्रह्म कबीर साहिब जी ने बताया है कि शब्द सतपुरुष का भी है जो कि सतपुरुष का प्रतीक है व ज्योति निरंजन(काल) का प्रतीक भी शब्द ही है। जैसे शब्द ज्योति निरंजन यह चांचरी मुद्रा को प्राप्त करवाता है इसको गोरख योगी ने बहुत अधिक तप करके प्राप्त किया जो कि आम(साधारण) व्यक्ति के बस की बात नहीं है और फिर गोरख नाथ काल तक ही साधना करके सिद्ध बन गए। मुक्त नहीं हो पाए। जब कबीर साहिब ने सत्यनाम तथा सार नाम दिया तब काल से छुटकारा गोरख नाथ जी का हुआ। इसीलिए ज्योति निरंजन नाम का जाप करने वाले काल जाल से नहीं बच सकते अर्थात् सत्यलोक नहीं जा सकते। शब्द ओंकार(ओ3म) का जाप करने से भूंचरी मुद्रा की स्थिति में साधक आ जाता हे। जो कि वेद व्यास ने साधना की और काल जाल में ही रहा। सोहं नाम के जाप से अगोचरी मुद्रा की स्थिति हो जाती है और काल के लोक में बनी भंवर गुफा में पहुँच जाते हैं। जिसकी साधना सुखदेव ऋषि ने की और केवल श्री विष्णु जी के लोक में बने स्वर्ग तक पहुँचा। शब्द रंरकार खैचरी मुद्रा दसमें द्वार(सुष्मणा) तक पहुँच जाते हंै। ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों ने ररंकार को ही सत्य मान कर काल के जाल में उलझे रहे। शक्ति(श्रीयम्) शब्द ये उनमनी मुद्रा को प्राप्त करवा देता है जिसको राजा जनक ने प्राप्त किया परन्तु मुक्ति नहीं हुई। कई संतों ने पाँच नामों में शक्ति की जगह सत्यनाम जोड़ दिया है जो कि सत्यनाम कोई जाप नहीं है। ये तो सच्चे नाम की तरफ ईशारा है जैसे सत्यलोक को सच्च खण्ड भी कहते हैं एैसे ही सत्यनाम व सच्चा नाम है। केवल सत्यनाम-सत्यनाम जाप करने का नहीं है। इन पाँच शब्दों की साधना करने वाले नौ नाथ तथा चैरासी सिद्ध भी इन्हीं तक सीमित रहे तथा शरीर में (घट में) ही धुनि सुनकर आनन्द लेते रहे। वास्तविक सत्यलोक स्थान तो शरीर (पिण्ड) से (अण्ड) ब्रह्मण्ड से पार है, इसलिए फिर माता के गर्भ में आए (उलटे लटके) अर्थात् जन्म-मृत्यु का कष्ट समाप्त नहीं हुआ। जो भी उपलब्धि (घट) शरीर में होगी वह तो काल (ब्रह्म) तक की ही है, क्योंकि पूर्ण परमात्मा का निज स्थान (सत्यलोक) तथा उसी के शरीर का प्रकाश तो परब्रह्म आदि से भी अधिक तथा बहुत आगे(दूर) है। उसके लिए तो पूर्ण संत ही पूरी साधना बताएगा जो पाँच नामों (शब्दों) से भिन्न है।
संतों सतगुरु मोहे भावै, जो नैनन अलख लखावै।। ढोलत ढिगै ना बोलत बिसरै, सत उपदेश दृढ़ावै।।
आंख ना मूंदै कान ना रूदैं ना अनहद उरझावै। प्राण पूंज क्रियाओं से न्यारा, सहज समाधी बतावै।।
घट रामायण के रचयिता आदरणीय तुलसीदास साहेब जी हाथ रस वाले स्वयं कहते हैं कि:- (घट रामायण प्रथम भाग पृष्ठ नं. 27)।
पाँचों नाम काल के जानौ तब दानी मन संका आनौ।
सुरति निरत लै लोक सिधाऊँ, आदिनाम ले काल गिराऊँ।
सतनाम ले जीव उबारी, अस चल जाऊँ पुरुष दरबारी।।
कबीर, कोटि नाम संसार में , इनसे मुक्ति न हो।
सार नाम मुक्ति का दाता, वाको जाने न कोए।।

गुरु नानक जी की वाणी में तीन नाम का प्रमाण:–

पूरा सतगुरु सोए कहावै, दोय अखर का भेद बतावै।
एक छुड़ावै एक लखावै, तो प्राणी निज घर जावै।।
जै पंडित तु पढ़िया, बिना दउ अखर दउ नामा।
परणवत नानक एक लंघाए, जे कर सच समावा।
वेद कतेब सिमरित सब सांसत, इन पढ़ि मुक्ति न होई।।
एक अक्षर जो गुरुमुख जापै, तिस की निरमल होई।।

भावार्थ: गुरु नानक जी महाराज अपनी वाणी द्वारा समाझाना चाहते हैं कि पूरा सतगुरु वही है जो दो अक्षर के जाप के बारे में जानता है। जिनमें एक काल व माया के बंधन से छुड़वाता है और दूसरा परमात्मा को दिखाता है और तीसरा जो एक अक्षर है वो परमात्मा से मिलाता है।

संत गरीबदास जी महाराज की अमृत वाणी में स्वांस के नाम का प्रमाण:–
गरीब, स्वांसा पारस भेद हमारा, जो खोजे सो उतरे पारा।
स्वांसा पारा आदि निशानी, जो खोजे सो होए दरबानी।
स्वांसा ही में सार पद, पद में स्वांसा सार। दम देही का खोज करो, आवागमन निवार।।
गरीब, स्वांस सुरति के मध्य है, न्यारा कदे नहीं होय।
सतगुरु साक्षी भूत कूं, राखो सुरति समोय।।
गरीब, चार पदार्थ उर में जोवै, सुरति निरति मन पवन समोवै।
सुरति निरति मन पवन पदार्थ(नाम), करो इक्तर यार।
द्वादस अन्दर समोय ले, दिल अंदर दीदार।
कबीर, कहता हूं कहि जात हूं, कहूं बजा कर ढोल। स्वांस जो खाली जात है, तीन लोक का मोल।।
कबीर, माला स्वांस उस्वांस की, फेरेंगे निज दास। चैरासी भ्रमे नहीं, कटैं कर्म की फांस।।

गुरु नानक देव जी की वाणी में प्रमाण:–

चहऊं का संग, चहऊं का मीत, जामै चारि हटावै नित।
मन पवन को राखै बंद, लहे त्रिकुटी त्रिवैणी संध।।
अखण्ड मण्डल में सुन्न समाना, मन पवन सच्च खण्ड टिकाना।।
पूर्ण सतगुरु वही है जो तीन बार में नाम दे और स्वांस की क्रिया के साथ सुमिरण का तरीका बताए। तभी जीव का मोक्ष संभव है। जैसे परमात्मा सत्य है। ठीक उसी प्रकार परमात्मा का साक्षात्कार व मोक्ष प्राप्त करने का तरीका भी आदि अनादि व सत्य है जो कभी नहीं बदलता है। गरीबदास जी महाराज अपनी वाणी में कहते हैं:
भक्ति बीज पलटै नहीं, युग जांही असंख। सांई सिर पर राखियो, चैरासी नहीं शंक।।
घीसा आए एको देश से, उतरे एको घाट। समझों का मार्ग एक है, मूर्ख बारह बाट।।
कबीर भक्ति बीज पलटै नहीं, आन पड़ै बहु झोल। जै कंचन बिष्टा परै, घटै न ताका मोल।।
बहुत से महापुरुष सच्चे नामों के बारे में नहीं जानते। वे मनमुखी नाम देते हैं जिससे न सुख होता है और न ही मुक्ति होती है। कोई कहता है तप, हवन, यज्ञ आदि करो व कुछ महापुरुष आंख, कान और मुंह बंद करके अन्दर ध्यान लगाने की बात कहते हैं जो कि यह उनकी मनमुखी साधना का प्रतीक है। जबकि कबीर साहेब, संत गरीबदास जी महाराज, गुरु नानक देव जी आदि परम संतों ने सारी क्रियाओं को मना करके केवल एक नाम जाप करने को ही कहा है।
एक नैसत्रो दमस नामक भविष्य वक्ता था। जिसकी सर्व भविष्य वाणियां सत्य हो रही हैं जो लगभग चार सौ वर्ष पूर्व लिखी व बोली गई थी। उसने कहा है कि सन् 2006 में एक हिन्दू संत प्रकट होगा अर्थात् संसार में उसकी चर्चा होगी। वह संत न तो मुसलमान होगा, न वह इसाई होगा वह केवल हिन्दू ही होगा। उस द्वारा बताया गया भक्ति मार्ग सर्व से भिन्न तथा तथ्यों पर आधारित होगा। उसको ज्ञान में कोई पराजित नहीं कर सकेगा। सन् 2006 में उस संत की आयु 50 व 60 वर्ष के बीच होगी। (संत रामपाल जी महाराज का जन्म 8 सितम्बर सन् 1951 को हुआ। जुलाई सन् 2006 में संत जी की आयु ठीक 55 वर्ष बनती है जो भविष्यवाणी अनुसार सही है।) उस हिन्दू संत द्वारा बताए गए ज्ञान को पूरा संसार स्वीकार करेगा। उस हिन्दू संत की अध्यक्षता में सर्व संसार में भारत वर्ष का शासन होगा तथा उस संत की आज्ञा से सर्व कार्य होंगे। उसकी महिमा आसमानों से ऊपर होंगी। नैसत्रो दमस द्वारा बताया सांकेतिक संत रामपाल जी महाराज हैं जो सन् 2006 में विख्यात हुए हैं। भले ही अनजानों ने बुराई करके प्रसिद्ध किया है परंतु संत में कोई दोष नहीं है।
उपरोक्त लक्षण जो बताए हैं ये सभी तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज में विद्यमान हैं।
 

“कौन तथा कैसा है कुल का मालिक?”

“कौन तथा कैसा है कुल का मालिक?”

  • Jagat Guru Rampal Jiसंत रामपाल जी महाराज

    जिन-जिन पुण्यात्माओं ने परमात्मा को प्राप्त किया उन्होंने बताया कि कुल का मालिक एक है। वह मानव सदृश तेजोमय शरीर युक्त है। जिसके एक रोम कूप का प्रकाश करोड़ सूर्य तथा करोड़ चन्द्रमाओं की रोशनी से भी अधिक है। उसी ने नाना रूप बनाए हैं। परमेश्वर का वास्तविक नाम अपनी-अपनी भाषाओं में कविर्देव (वेदों में संस्कृत भाषा में) तथा हक्का कबीर (श्री गुरु ग्रन्थ साहेब में पृष्ठ नं. 721 पर क्षेत्राीय भाषा में) तथा सत् कबीर (श्रीधर्मदास जी की वाणी में क्षेत्राीय भाषा में) तथा बन्दी छोड़ कबीर (सन्त गरीबदास जी के सद्ग्रन्थ में क्षेत्रीय भाषा में) कबीरा, कबीरन् व खबीरा

    या खबीरन् (श्री र्कुआन शरीफ़ सूरत फुर्कानि नं. 25, आयत नं. 19, 21, 52, 58, 59 में क्षेत्राीय अरबी भाषा में)। इसी पूर्ण परमात्मा के उपमात्मक नाम अनामी पुरुष, अगम पुरुष, अलख पुरुष, सतपुरुष, अकाल मूर्ति, शब्द स्वरूपी राम, पूर्ण ब्रह्म, परम अक्षर ब्रह्म आदि हैं, जैसे देश के प्रधानमंत्राी का वास्तविक शरीर का नाम कुछ और होता है तथा उपमात्मक नाम प्रधान मंत्री जी, प्राइम मिनिस्टर जी अलग होता है। जैसे भारत देश का प्रधानमंत्री जी अपने पास गृह विभाग रख लेता है। जब वह उस विभाग के दस्त्तावेजों पर हस्त्ताक्षर करता है तो वहाँ गृहमंत्री की भूमिका करता है तथा अपना पद भी गृहमन्त्री लिखता है, हस्त्ताक्षर वही होते हैं। इसी प्रकार ईश्वरीय सत्ता को समझना है।

    जिन सन्तों व ऋषियों को परमात्मा प्राप्ति नहीं हुई, उन्होंने अपना अन्तिम अनुभव बताया है कि प्रभु का केवल प्रकाश देखा जा सकता है, प्रभु दिखाई नहीं देता क्योंकि उसका कोई आकार नहीं है तथा शरीर में धुनि सुनना आदि प्रभु भक्ति की उपलब्धि है।
    आओ विचार करें – जैसे कोई अंधा अन्य अंधों में अपने आपको आँखों वाला सिद्ध किए बैठा हो और कहता है कि रात्राी में चन्द्रमा की रोशनी बहुत सुहावनी मन भावनी होती है, मैं देखता हूँ। अन्य अन्धे शिष्यों ने पूछा कि गुरु जी चन्द्रमा कैसा होता है। चतुर अन्धे ने उत्तर दिया कि चन्द्रमा तो निराकार है वह दिखाई थोड़े ही दे सकता है। कोई कहे सूर्य निराकार है वह दिखाई नहीं देता रवि स्वप्रकाशित है इसलिए उसका केवल प्रकाश दिखाई देता है। गुरु जी के बताये अनुसार शिष्य 2) घण्टे सुबह तथा 2) घण्टे शाम आकाश में देखते हैं। परन्तु कुछ दिखाई नहीं देता। स्वयं ही विचार विमर्श करते हैं कि गुरु जी तो सही कह रहे हैं, हमारी साधना पूरी 2) घण्टे सुबह शाम नहीं हो पाती। इसलिए हमंे सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश दिखाई नहीं दे रहा। चतुर गुरु जी की व्याख्या पर आधारित होकर उस चतुर अन्धे(ज्ञान नेत्रा हीन) की व्याख्या के प्रचारक करोड़ों अंधे (ज्ञाननेत्रा हीन) हो चुके हैं। फिर उन्हें आँखों वाला (तत्वदर्शी सन्त) बताए कि सूर्य आकार में है और उसी से प्रकाश निकल रहा है। सूर्य बिना प्रकाश किसका देखा? इसी प्रकार चन्द्रमा से प्रकाश निकल रहा है नेत्राहीनों! चन्द्रमा के बिना रात्राी में प्रकाश कैसे हो सकता है? जैसे कोई कहे कि ट्यूब लाईट देखी, फिर कोई पूछे कि ट्यूब कैसी होती है जिसकी आपने रोशनी देखी है? उत्तर मिले कि ट्यूब तो निराकार होने के कारण दिखाई नहीं देती। केवल प्रकाश देखा जा सकता है। विचार करें:- ट्यूब बिना प्रकाश कैसा?
    यदि कोई कहे कि हीरा स्वप्रकाशित होता है। फिर यह भी कहे कि हीरे का केवल प्रकाश देखा जा सकता है, क्योंकि हीरा तो निराकार है, वह दिखाई थोड़े ही देता है, तो वह व्यक्ति हीरे से परिचित नहीं है। फोकट जौहरी बना है। जो परमात्मा को निराकार कहते हैं तथा केवल प्रकाश देखना तथा धुनि सुनना ही प्रभु प्राप्ति मानते हैं वे पूर्ण रूप से प्रभु तथा भक्ति से अपरिचित हैं। जब उनसे प्रार्थना की कि कुछ नहीं देखा है तुमने, अपने अनुयाईयों को भ्रमित करके दोषी हो रहे हो। न तो आपके गुरुदेव के तत्वज्ञान रूपी नेत्रा हैं तथा न ही आपके, दुनियाँ को भ्रमित मत करो। इस बात पर सर्व अन्धों (ज्ञान नेत्रा हीनों) ने उठा लिए लट्ठ कि हम तो झूठे, तूं एक सच्चा। आज वही स्थिति मुझ दास(रामपाल दास) के साथ है।

    प्रश्न:- इस बात का निर्णय कैसे हो कि किस सन्त के विचार ठीक है किसके गलत हैं?

    उत्तर:- मान लिजिए जैसे किसी अपराध के विषय में पाँच वकील अपना-अपना विचार व्यक्त कर रहे हैं। एक कहे कि इस अपराध पर संविधान की धारा 301 लगेगी, दूसरा कहे 302, तीसरा कहे 304, चैथा कहे 306 तथा पाँचवां वकील 307 को सही बताए।
    ये पाँचों ठीक नहीं हो सकते। केवल एक ही ठीक हो सकता है यदि उसकी व्याख्या अपने देश के पवित्रा संविधान से मिलती है। यदि उसकी व्याख्या भी संविधान के विपरीत है तो पाँचों वकील गलत हैं। इसका निर्णय देश का पवित्रा संविधान करेगा जो सर्व को मान्य होता है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न विचारधाराओं में तथा साधनाओं में से कौन-सी शास्त्रा अनुकूल है या कौन-सी शास्त्रा विरुद्ध है? इसका निर्णय पवित्रा सद्ग्रन्थ ही करेंगे, जो सर्व को मान्य होना चाहिए (यही प्रमाण पवित्रा श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में)।

    प्रश्न:- कुछेक शास्त्राविधि त्याग कर मनमाना आचरण (पूजा) करने वाले हठ योग के आधार से घण्टों एक स्थान पर बैठकर ध्यान करके बताते हैं कि हमें प्रकाश दिखाई देता है। वह क्या है?

    उत्तर:- जैसे सूर्य का प्रकाश तालाब में गिरा तालाब के जल से प्रकाश का प्रतिबिम्ब दिवार पर बन जाता है। दिवार पर सूर्य नहीं दिखाई देता केवल मन्दा.2 प्रकाश दिखाई देता है। वह सूर्य नहीं है तथा न ही उसका पूर्ण प्रकाश है। उसको देख कर जो कहता है कि सूर्य का प्रकाश देखा परन्तु सूर्य नहीं है निराकार है तो वह नशा किए हुऐ है या मन्दबुद्धि है। इसी प्रकार अधूरे ज्ञान के आधार पर तत्वज्ञान रहित सन्त तथा उनके अनुयाई कहते हैं परमात्मा निराकार है केवल प्रकाश ही देखा जा सकता है। पूर्ण परमात्मा (सतपुरूष)साकार है उसकाशरीर मानव सदृश प्रकाशमय है। उसका प्रकाश अन्य ब्रह्मण्डों प्रतिबिम्ब रूप में दृष्टिगोचर है। जो ब्रह्मण्ड में गिर रहा है। उस प्रतिबिम्ब को देखकर व्याख्या की जा रही है कि परमात्मा का प्रकाश देखा परन्तु परमात्मा निराकार है वह दिखाई नहीं देता। जब पूर्ण साधना शास्त्राविधि अनुसार की जाती है तो उस से साधक की दिव्यदृष्टि खुल कर पूर्ण परमात्मा के प्रकाशमय शरीर के दर्शन होते हैं। परमात्मा मानव सदृश तेजोमय शरीर युक्त है जो कहते है कि परमात्मा का प्रकाश देखा तो भी प्रकाश परमात्मा नहीं हुआ। क्योंकि सर्व सद्ग्रन्थों में लिखा है कि परमात्मा की प्राप्ति करनी चाहिए। परमात्मा की प्राप्ति से परमशान्ति होती है। जैसे कोई कहे कि हलवा (कड़हा) प्रसाद की महक आ रही है महक हलवा (कड़हा) प्रसाद नहीं है। महक से पेट नहीं भरता तथा न ही हलवे का स्वाद आता है। यह तो हलवा खाने से ही बात बनेगी। इसलिए जो कहते है कि परमात्मा का प्रकाश देखा वे परमात्मा के लाभ से हलवे की तरह वंचित है। उनसे प्रार्थना है कि उस परमात्मा को प्राप्त करने की विधि मुझ दास (रामपाल दास) के पास है। निःशुल्क प्राप्त करें।
                जिन आँखों वालों (पूर्ण सन्तों) ने चन्द्रमा (पूर्ण परमात्मा) को देखा परमात्मा पाया उन में से कुछ के नाम हैं:-
    (क) आदरणीय धर्मदास साहेब जी (ख) आदरणीय दादू साहेब जी (ग) आदणीय मलूक दास साहेब जी (घ) आदरणीय गरीबदास साहेब जी (ड़) आदरणीय नानक साहेब जी (च) आदरणीय घीसा दास साहेब जी आदि।



जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के अमृत वचन सर्व पवित्र शास्त्रो के आधार पर

जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के अमृत वचन सर्व पवित्र शास्त्रो के आधार पर

01. तीर्थ-व्रत करने से कोई भी लाभ नही । 
गीता अध्यय 6 शलोक 16 में प्रमाण देखिये

02. धर्मदास जी को पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी उस समय मिले जब धर्मदास जी तीर्थ करने वृदांवन में गये हुए थे, धर्मदास को कबीर साहेब जी ने बताया कि तीर्थ करने से हमें क्या लाभ और क्या हानि होती है ?
तीर्थ जल में कच्च और मच्छा जिव बहूत से रहते है।
उनकी मुक्ति ना होतीं वो कष्ट बहूत से सहते है ।।
कबीर साहेब ने कहा कि
धर्मदास जी आप तो साल या छः महीने में 1 बार तीर्थ स्थान पर स्नान करने आते हो, लेकिन तीर्थ जल में तो बहुत से जीव हमेशा रहते है,और कष्ट भी सहते है फिर भी उनकी मुक्ति नही होती है तो धर्मदास जी आपकी मुक्ति कैसे संभव है।
03. कबीर साहेब जी ने पूछा की गीता ज्ञान दाता गीता अध्याय 4 के श्लोक 5 में कहता है की अर्जुन तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो गए है तू नही जानता में जनता हूं, इसका क्या अर्थ होता है ?  
तो धर्मदास जी कोई जवाब नही दे पाये, 
फिर गीता ज्ञान दाता कहता है कि अर्जुन तुम्हे पूरी मुक्ति चाहिए तो तत्त्वदर्शी संत के पास जा वही तेरी मिक्ति करवा सकता है । ये मेरे बस का नही है, में तो खुद जन्म मृत्यु के अंतर्गत हूं।
जब इन भगवानो की जन्म मृत्यु होती है तो हम किस खेत की मूली है,
बंधे से बंधा मिले वो छूटे कोन उपाय।
करो बंदगी निर्बंध की जो जम से लेट छुताय।।
ये तीन लोक के मालिक होते हुए भी जन्म मृत्यु में आते है, तो ये हमारी क्या मुक्ति कर सकते है।
गीता अध्याय 15 शलोक 4 में कहा है कि तत्त्वदर्शी संत से तत्वज्ञान प्राप्त करके परमेशवर के उस परमपद की खोज करनी चाहिए, जहां जाने के बाद साधक लौटकार फिर संसार में कभी नही आते।
पूर्ण मुक्ति चाहिए तो तत्त्वदर्शी संत की तलाश करो और उसके बताये हुए मार्ग पर चल तभी तेरी मुक्ति संभावः है
आज के समय में तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज है जो हमारे शास्त्रों के आधार पर भक्ति दे रहे है जिससे आपकी मुक्ति बिल्कुल है,
सतलोक एक्सप्रेस न्यूज़ 
  1.      :- धर्मदास जी ने कबीर साहेब से नाम दीक्षा लिया और फिर उन्हें पूर्ण मुक्ति मिली।
  2.     :-भगत पन्ना दास छत्तरपुर मध्यप्रदेश से उन्होंने बताया कि तीर्थ व्रत करके थक चुके थे , और चितकुट तीर्थ पर वह पैदल जाते थे , और आसपास का कोई भी तीर्थ नही छोड़ा , 

ये चारो धामो पर भी अपने बच्चे की बीमारी से निजात पाने के लिए गए फिर भी परेशानिया कम नही हुई, 8 दिन मथुरा में बिना कुछ खाये पीये तीर्थ किया फिर भी कोई लाभ नही मिला और मरने के कगार पर थे, उनका संत महात्माओं से विश्वास बिल्कुल उठ चुका था, लेकिन जब उनको ज्ञान गंगा पुस्तक मिली फिर संत रामपाल जी से नाम दीक्षा लिया तब सारी परेशानिया समाप्त हो गयी, और बच्चा भी ठीक हो गया , उन्होंने बताया की हम तो धन्य हो गए संत रामपाल जी महाराज से जुड़ कर।
यदि आपको भी लाभ चाहिए तो सतलोक आश्रम आइये और अपनी मुक्ति और सांसारिक दुखो से छुटकारा पाइये,
नोट :- हमारी पुस्तक ज्ञान गंगा और गीता तेरा ज्ञान अमृत फ्री में मंगवाने के लिए हमारे निम्न नंबर पर अपना पूरा पता , पिन कोड के साथ लिखकर sms करे,
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संत रामपाल जी महाराज के आगे सभी संत ज्ञान में पड़े बोने

सतलोक एक्सप्रेस  न्यूज़, बेतूल
21 दिसंबर 2016

संत रामपाल जी महाराज के आगे सभी संत ज्ञान में पड़े बोने

               मध्य प्रदेश के जिला बैतूल की तहसील मुलताई में संत रामपाल जी महाराज के हजारों समर्थकों ने अपने गुरुदेव का सत्संग सुना एवं सत्संग में बड़ी भारी संख्या में आम जनमानस भी उमड़ा उन लोगों ने संत रामपाल जी महाराज के सत्संग को सुना, उनकी शिक्षाओं को, उनके आदेशों का क्रियान्वन होते देखा।
                 जिसमें उन्होंने विवेचन किया कि किस प्रकार से संत रामपालजी महाराज समाज में व्याप्त बुराइयों, नशाखोरी, भ्रष्टाचार, दहेज प्रथा, जाति बंधन, धर्म बंधन, भाषा बंधन आदि विकारों को त्याग करवाकर निश्छल एवं निर्मल मानव का निर्माण कर रहे हैं ऐसे संत की तो भूरी-भूरी प्रशंसा करनी चाहिए।
सतलोक एक्सप्रेस न्यूज़

               भले ही आज संत रामपाल जी महाराज जेल में हैः परंतु उनका ज्ञान जंजालों में फंसे मानव को बाहर निकाल कर आध्यात्मिकता के उच्च पथ पर लगाने की ओर प्रशस्त कर रहा है ।

Exclusive Report::- साईमन कमीशन का सच्च

साईमन कमीशन का सच्च
बालोतरा, भैरुलाल  नामा

★क्या था *साईमन कमीशन*? हमें विद्यालय में पढाया गया था कुछ और वास्तिविकता थी कुछ और ★

सतलोक एक्सप्रेस न्यूज


जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर विदेश से पढकर भारत में बडौदा नरेश के यहां नौकरी करने लगे तो उनके साथ बहुत ज्यादा जातिगत भेदभाव हुआ। इस कारण उन्हें 11 वें दिन ही नौकरी छोड़कर बडौदा से वापस बम्बई जाना पड़ा। उन्होंने अपने समाज को अधिकार दिलाने की बात ठान ली।
उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को बार-बार पत्र लिखकर शूद्र वर्ग की स्थिति से अवगत करवाया और उन्हें अधिकार देने की माँग की।
बाबा साहेब के पत्रों में वर्णित छुआछूत व भेदभाव के बारे में पढकर अंग्रेज़ दंग रह गए कि क्या एक मानव दूसरे मानव के साथ ऐसे भी पेश आ सकता है। बाबा साहेब के तथ्यों से परिपूर्ण तर्कयुक्त पत्रों से अंग्रेज़ी हुकूमत अवाक् रह गई और 1927 में शूद्र वर्ग की स्थिति के अध्ययन के लिए मिस्टर साईमन की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया गया।

जब कांग्रेस व महत्मा गांधी को कमीशन के भारत आगमन की सूचना मिली तो उन्हें लगा कि यदि यह कमीशन भारत आकर शूद्र वर्ग की वास्तविक स्थिति का अध्ययन कर लेगा तो उसकी रिपोर्ट के आधार पर अंग्रेजी हुकूमत इस वर्ग के लोगों को अधिकार दे देगी। कांग्रेस व महत्मा गांधी ऐसा होने नहीं देने चाहते थे।
अतः 1927 में जब साईमन कमीशन अविभाजित भारत के लाहौर पहुंचा तो पूरे भारत में कांग्रेस की अगुवाई में जगह-जगह पर विरोध प्रदर्शन हुआ और लाहौर में मिस्टर साईमन को काले झंडे दिखा कर go back के नारे लगाए गए। बाबा साहेब स्वयं मिस्टर साईमन से मिलने लाहौर पहुंचे और उन्हें 400 पन्नों का प्रतिवेदन देकर शूद्र वर्ग की स्थिति से अवगत कराया। कांग्रेस ने मिस्टर साईमन की आँखों में धूल झोंकने के लिए उनके सामने ब्राह्मणों को शूद्र वर्ग के लोगों के साथ बैठ कर भोजन करवाया (बाद में ब्राह्मण अपने घर जाकर गोमूत्र पीकर उससे नहाये)। यह सब पाखण्ड देखकर बाबा साहेब मिस्टर साईमन को गांव के एक तालाब पर ले गये। उनके साथ एक कुत्ता भी था। वह कुत्ता अपने स्वभाव के मुताबिक सबके सामने उस तालाब में डुबकी लगाकर नहा कर बाहर आया। तब बाबा साहेब ने एक शूद्र वर्ग के व्यक्ति को तालाब का पानी पीने के लिए कहा। उस व्यक्ति ने घबराते हुए जैसे ही पानी पिया तो आसपास के ब्राह्मणों ने हमला बोल दिया। आखिरकार बाबा साहेब सहित अन्य व्यक्तियों को पास की एक मुस्लिम बस्ती में शरण लेकर अपना बचाव करना पड़ा। मिस्टर साईमन को सब कुछ समझ में आ गया। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को वस्तु स्थिति रिपोर्ट सौंप दी। बाबा साहेब भी बार-बार पत्राचार करते रहे और उन्होंने लंदन जाकर अंग्रेजी हुकूमत के वरिष्ठ अधिकारियों व राजनेताओं को बार-बार भारत की शूद्र वर्ग को अधिकार देने की मांग की।
बाबा साहेब के तर्कों को अंग्रेजी हुकूमत नकार नहीं सकी और उसने भारत की शूद्र वर्ग को अधिकार देने के लिए 1930 में communal award (संप्रदायिक पंचाट) पारित किया।
हमें विद्यालय में यह पढाया गया था कि कांग्रेस ने साईमन कमीशन को काले झंडे दिखा कर go back के नारे लगाए। परंतु उसने वास्तव में ऐसा क्यों किया, यह नहीं पढाया गया 
यह सोचने की बात है । 
जय भीम जय मूलनिवासी 
भैरूलाल नामा 
फूले शाहू अम्बेडकर विचारक 
09461156033

संत रामपालजी महाराज के अनुयायीयो ने राजनाथसिंह को सौंपा ग्यापन

सतलोक एक्सप्रेस न्यूज़-चंदौली,17 दिसम्बर 2016

 RanaramBhatiya

आज चंदौली उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह जब एक जनसभा को संबोधित करने पहुंचे तो सैकड़ो संत रामपाल जी महाराज के समर्थक हाथों में बैन्नर लेकर खड़े हो गए, एक बार तो राजनाथ सिंह जी भी स्थिति को लेकर असमंजस में पड़ गए, क्योंकि उनको लगातार संत रामपाल के अनुयायिओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, आज ऐसी स्थिति जब उनके सामने पड़ी तो उन्होंने अपने अधिकारियों को बात करने के लिए भेजे, संत समर्थकों को लगा की शायद आज उनके ऊपर हो रहे अन्याय की कहानी गृहमंत्री महोदय गंभीरता से लेंगे और मंच से ही कोई ठोस कार्यवाही का ऐलान करेंगे, ज्ञापन की कॉपी लेकर जब अधिकारी राजनाथ सिंह जी के पास पहुंचे और उनको कॉपी थमाई तो राजनाथ सिंह जी ने पुरे ज्ञापन को पड़ा उसी समय उनके चेहरे पर चिंताजनक हाव भाव उभर आये, शायद इसलिए की ज्ञापन पे हरियाणा भाजपा सरकार की काली करतूतों का जिक्र था, इसलिए बिना समय गवाए उन्होंने ज्ञापन पर संज्ञान लिए बगैर भाषण को आगे बड़ा दिया। लेकिन संत रामपाल के शिष्य कहीं न कहीं संतुष्ट जरूर दिख रहे थे, क्योंकि उनका मकसद हंगामा खड़ा करना नही था, सिर्फ अपनी आवाज को पहुचना था, जो अगली बार और ऊँची हो सकती है।

चंदौली,__रैली को संबोधित करते हुए गृहमंत्री राजनाथसिंह
चंदौली, __संत रामपालजी महाराज के अनुयायी


आपको क्या लगता है क्या गृहमंत्री जी को मंच से उस ज्ञापन पर अपने विचार देने चाहिए थे? क्योंकि जिन लोगों ने ज्ञापन दिया उन्ही लोगों से राजनाथ सिंह जी वोट मांगने आये थे।

आज जिला बारां राजस्थान में सत्संग हुआ जिसमे 132 नई भक्तात्माओ जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपालजी से नाम उपदेश ( नाम दीक्षा ) ली !

आज जिला बारां राजस्थान में सत्संग हुआ जिसमे 132 नई  भक्तात्माओ  जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपालजी से नाम उपदेश ( नाम दीक्षा ) ली !

//hindimehelp.com/tools/jet-planes/jet-planes-indian-flag-HMHpe.js

कुरुक्षेत्र में संत रामपाल जी महाराज के अनुयायिओं ने 1 लाख गीता का फ्री वितरण करके समाज के सामने एक नई मिशाल पेश की

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सतलोक आश्रम न्यूज़, कुरुक्षेत्र
10 नवम्बर 2016
कुरुक्षेत्र में संत रामपाल जी महाराज के अनुयायिओं ने 1 लाख गीता का फ्री वितरण करके समाज के सामने ये साबित कर दिया की संत रामपाल जी महाराज समाज को अध्यात्म की ऊंचाइयों पर लेकर जाने की सोच रखते हैं, उनके इसी उदेश्य में रोड़ा बन रहे नकली संत महंत, सरकारी मशीनरी को अब समझ जाना चाहिए की समाज अब जागरूक हो चूका है, कुरुक्षेत्र में चल रहे गीत जयंती महोत्सव को तस्वीरों में कैद किया है हमारे रिपोर्टर ने……हर तस्वीर आपको समझाएगी की देश कितना उत्साहित है ?
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हाईकोर्ट के माननीय जज मुद्दे से क्यू भटक रहे है? सवाल ये नहीं है कि जनहित याचिका कौन दायर कर सकता है? मुद्दा ये है त्रुटि युक्त गीता का विमोचन किया जा रहा है..

Exclusive Report ::- सच बनाम झूठ

हाईकोर्ट के माननीय जज मुद्दे से क्यू भटक रहे है? सवाल ये नहीं है कि जनहित याचिका कौन दायर कर सकता है?
मुद्दा ये है त्रुटि युक्त गीता का विमोचन किया जा रहा है.
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मुद्दा ये है उस मनीषी ज्ञानानंद द्वारा अनुवादित गीता का विमोचन किया जा रहा है जिस ज्ञानानंद को ज्ञान चर्चा मॆ तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ज्ञान चर्चा में परास्त चुके हैं…
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मुद्दा ये है कि जनता के खून पसीने की कमाई के करोड़ों रुपये मुख्यमंत्री हरियाणा द्वारा अपने गुरु को महिमा मंडित करने में खर्च किया जा रहा है…
मुद्दा ये है भारत के भविष्य बच्चों को उस गीता को पढ़ाने की बात की जा रही है जिसमें अनुवादकों ने अनेक गलतियाँ की हुई हैं उन्हें सुधारने की कोशिश करनी चाहिये…
(हाईकोर्ट के जजों द्वारा आरोपी को अपराधी कहना न्यायसंगत नहीं है)…
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दुख की बात है कि हाईकोर्ट ने जनहित याचिका के मुख्य विषय पर बात ना उठाकर अन्य बात उठाई जो इनके पक्षपात को इंगित करती है।

माननीय जजों आप आरोपी को अपराधी कैसे कह सकते हो??

आप आरोपी व्यक्ति को अपराधी नहीं कह सकते…पहले राजाओं के जुबान पर ही कानून होता था लेकिन आज ऐसा नहीं है, आज लोकतांत्रिक भारत में संविधान और कानून की व्यवस्था है जिससे अन्तर्गत जज और नेता भी आते है। ये संविधान के अन्तर्गत है, संविधान से बाहर नहीं। जज की जुबान कानून नहीं है, अकबर और जज में अंतर है।
माननीय जज जानना चाहते है कि सन्त रामपाल जी महाराज ने जनहित के क्या कार्य किये है…
यह बात उन लोगों से पूछो जिन्होंने उनकी दया उदारता व रहमत को देखा है और अनुभव किया है। ऐसे जनहित के कार्य उन लोगों को कैसे दिखाई दे सकते है जो एडी से चोटी तक बेईमानी तथा भ्रष्टाचार में डूबे हो??
पक्षपाती जज कभी भी न्याय नहीं कर सकता। और ऐसे जजों से न्याय की उम्मीद भी नहीं की जा सकती।
सत्यमेव जयते!
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यदि आप मानते हो की आरक्षण की वजह से ही देश बर्बाद हुआ है, तो फिर यह पोस्ट सिर्फ आपके लिए ही है….जरूर पढ़ें

यदि आप मानते हो की आरक्षण की वजह से ही देश बर्बाद हुआ है, तो फिर यह पोस्ट सिर्फ आपके लिए ही है….जरूर पढ़ें

” लश्कर भी तुम्हारा है , सरदार भी तुम्हारा है।

तुम झूठ को सच लिख दो अखबार भी तुम्हारा है।
तुम जो कहो वो सच, हम जो कहें वो झूठ
मुल्क में नफरत का ऐसा तूफान मचा ड़ाला है।”
कुछ बुद्धिमान बोलते है कि आरक्षण ने देश को बर्बाद कर दिया”
1. अब आप बताइये कि देश आजाद होने के बाद 14 व्यक्ति देश के राष्ट्रपति बने उनमे से कितने आरक्षण वाले बने….
2. 15 प्रधानमन्त्री बने उनमे से कितने आरक्षण वाले बने…
3. 43 उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीश बने कितने आरक्षण वाले बने…
4. 19 मुख्य चुनाव आयुक्त बने उनमे से कितने आरक्षण वाले बने…
5. देश के जो बड़े घोटाले हुए उनमे कितने दलित घोटालेबाज हैं, बताएं ज़रा…
6. आप बताइये भारत देश में कितने दलित लोग ऐसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों के व्यवसायी हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं ?
7. अब आप बताइये देश को बर्बाद कौन कर रहा है….अगर सम्भावित ब्लैकमनी वालो की लिस्ट देखें तो कोई आरक्षण वाला नजर नही आता…
8. तो फिर देश को बर्बाद कौन कर रहा है…
9. जितने लोग बेंको का रूपया हज़्म करके बैठे है या भाग गए उनमे कितने आरक्षण वाले है शायद कोई नही तो फिर देश को बर्बाद कौन कर रहा है….
10. बड़े बड़े ठेकेदार जो सरकारी ठेके लेते है रोड बनाते है सरकारी बिल्डिंग्स बनाते है उनमे कितने आरक्षण वाले है तो जवाब मिलेगा 1 या 2 प्रतिशत
11. तो फिर इस देश को बर्बाद आरक्षण कर रहा है या फिर मेरिट वाले…
12. जब ब्लैक मनी लिस्ट में एक भी नाम रिजर्व कैटेगरी के लोगों का नही, सारे नाम जनरल के हैं । फिर भी कुछ बेवकूफ कहते हैं कि देश को रिजर्वेशन वाले बर्बाद कर रहे हैं….सच में इससे बड़ा जोक कोई और हो ही नही सकता !!
13. बोफोर्स तोप घोटाला , कॉमन वैल्थ घोटाला , आदर्श सोसायटी घोटाला, सत्यम घोटाला, काला धन घोटाला, स्टाम्प घोटाला, यूरिया घोटाला, चारा घोटाला, सुखराम टेलिकॉम घोटाला, शेयर घोटाला, चीनी घोटाला….बहुत लंबी सूची है इन घोटालों की, ये सभी घोटाले क्या आरक्षण प्राप्त लोगों ने किये हैं ? बताएँगे इसमें किसी दलित का नाम ?
**कब तक बेवकूफ बनाते रहोगे**

और हाँ ! फिर भी हम लोग अपने हुनर और काबलियत से थोडा सा आरक्षण का सहारा पा कर क्या कामयाब होने लगे, आपके पेट में मरोड़े उठने लगे….

” जिनको अपनी थोथी मेरिट पे घमंड है और आरक्षण से परेशानी है वो अपने बच्चों को 5 साल वहाँ पढ़ाए जहाँ ग़रीब बच्चे अभावों में रहकर पढ़ते हैं,
फिर देखना सारी मेरिट हवा न हो जाए तो कहना !!!”
और यदि कुछ तथाकथित उच्च वर्ग के लोग ये कहते हैं की, वो किसी से भेदभाव नही करते….तो उनसे एक ही सवाल ?
क्या वो दलित परिवार से रोटी – बेटी का रिश्ता करने को तैयार हैं, जातियाँ खत्म करने को तैयार है।।अगर नही….
तो फिर मान लीजिये अभी आरक्षण ख़त्म नही होना चाहिए…
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