जगतगुरू तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज का शिवगंज सिरोही में विशाल सत्संग का आयोजन

🙏 सदगुरूदेव जी की जय 🙏 
 
🙏   सत साहेब   🙏
पूर्ण परमात्मा बंदीछोड़ सदगुरू रामपालजी महाराज जी की असीम कृपा से राजस्थान में पाली, जालोर व सिरोही जिलो की विशाल सत्संग का आयोजन दिनांक 06-11-2016 रविवार को शिवगंज (सिरोही) मे रखा गया है | आप सभी से प्रार्थना है किे अधिक से अधिक प्रचार कर नये भगतात्माओ को साथ लेकर अवश्य पधारे –
स्थान = टाउन हाल (शिवगंज चौराया, संतोषी माता मंदिर), डाक बंगले के पास, शिवगंज जिला  सिरोही राजस्थान
दिनांक व समय = 06-11-2016 रविवार  सुबह 11 बजे से 2 बजे तक 
शिवगंज सत्संग सेवा संपर्क सूत्र 
95495-74546 रतनदास सुमेरपुर, 
98282-96029 कमलप्रकाशदास सुमेरपुर, 
77424-26468 आनन्ददास पिंडवाड़ा, 
80944-10825 सुरेशदास आहोर,  
98281-19980 विनोददास शिवगंज, 
96943-13114 निकेशदास बेडा, 
72309-99180 लक्ष्मणदास लाटाडा 
नोट:- भंडारे की व्यवस्था नहीं है ।
अन्‍य सम्पर्क नम्बर 
पाली (राज.) नामदान केन्द्र – 81076-74153
पाली –  94141-55605,  94142-05732, 97821-26869, 88298-95252
जालोर –   80940-97067,  98292-08335, 97831-72809
जय बन्दी- छोड की 
सत साहेब

जगतगुरू तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज का शिवगंज सिरोही में विशाल सत्संग का आयोजन

🙏 सदगुरूदेव जी की जय 🙏 
 
🙏   सत साहेब   🙏
पूर्ण परमात्मा बंदीछोड़ सदगुरू रामपालजी महाराज जी की असीम कृपा से राजस्थान में पाली, जालोर व सिरोही जिलो की विशाल सत्संग का आयोजन दिनांक 06-11-2016 रविवार को शिवगंज (सिरोही) मे रखा गया है | आप सभी से प्रार्थना है किे अधिक से अधिक प्रचार कर नये भगतात्माओ को साथ लेकर अवश्य पधारे –
स्थान = टाउन हाल (शिवगंज चौराया, संतोषी माता मंदिर), डाक बंगले के पास, शिवगंज जिला  सिरोही राजस्थान
दिनांक व समय = 06-11-2016 रविवार  सुबह 11 बजे से 2 बजे तक 
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95495-74546 रतनदास सुमेरपुर, 
98282-96029 कमलप्रकाशदास सुमेरपुर, 
77424-26468 आनन्ददास पिंडवाड़ा, 
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पाली –  94141-55605,  94142-05732, 97821-26869, 88298-95252
जालोर –   80940-97067,  98292-08335, 97831-72809
जय बन्दी- छोड की 
सत साहेब

हृदयाघात तथा गर्म पानी पीना, पढिए पुरी पोस्ट

हृदयाघात तथा गर्म पानी पीना

यह भोजन के बाद गर्म पानी पीने के बारे में ही नहीं हृदयाघात के बारे में भी एक अच्छा लेख है। चीनी और जापानी अपने भोजन के बाद गर्म चाय पीते हैं, ठंडा पानी नहीं। अब हमें भी उनकी यह आदत अपना लेनी चाहिए। जो लोग भोजन के बाद ठंडा पानी पीना पसन्द करते हैं यह लेख उनके लिए ही है।
भोजन के साथ कोई ठंडा पेय या पानी पीना बहुत हानिकारक है क्योंकि ठंडा पानी आपके भोजन के तैलीय पदार्थों को जो आपने अभी अभी खाये हैं ठोस रूप में बदल देता है। इससे पाचन बहुत धीमा हो जाता है। जब यह अम्ल के साथ क्रिया करता है तो यह टूट जाता है और जल्दी ही यह ठोस भोजन से भी अधिक तेज़ी से आँतों द्वारा सोख लिया जाता है। यह आँतों में एकत्र हो जाता है। फिर जल्दी ही यह चरबी में बदल जाता है और कैंसर के पैदा होने का कारण बनता है।
इसलिए सबसे अच्छा यह है कि भोजन के बाद गर्म सूप या गुनगुना पानी पिया जाये। एक गिलास गुनगुना पानी सोने से ठीक पहले अभी पीना चाहिए। इससे खून के थक्के नहीं बनेंगे और आप हृदयाघात से बचे रहेंगे।
एक हृदय रोग विशेषज्ञ का कहना है कि यदि इस संदेश को पढ़ने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसे १० लोगों को भेज दे, तो वह कम से कम एक जान बचा सकता है।
*कृपया इसे अधिक से अधिक व्यक्तियों के साथ शेयर करें।*

हृदयाघात तथा गर्म पानी पीना, पढिए पुरी पोस्ट

हृदयाघात तथा गर्म पानी पीना

यह भोजन के बाद गर्म पानी पीने के बारे में ही नहीं हृदयाघात के बारे में भी एक अच्छा लेख है। चीनी और जापानी अपने भोजन के बाद गर्म चाय पीते हैं, ठंडा पानी नहीं। अब हमें भी उनकी यह आदत अपना लेनी चाहिए। जो लोग भोजन के बाद ठंडा पानी पीना पसन्द करते हैं यह लेख उनके लिए ही है।
भोजन के साथ कोई ठंडा पेय या पानी पीना बहुत हानिकारक है क्योंकि ठंडा पानी आपके भोजन के तैलीय पदार्थों को जो आपने अभी अभी खाये हैं ठोस रूप में बदल देता है। इससे पाचन बहुत धीमा हो जाता है। जब यह अम्ल के साथ क्रिया करता है तो यह टूट जाता है और जल्दी ही यह ठोस भोजन से भी अधिक तेज़ी से आँतों द्वारा सोख लिया जाता है। यह आँतों में एकत्र हो जाता है। फिर जल्दी ही यह चरबी में बदल जाता है और कैंसर के पैदा होने का कारण बनता है।
इसलिए सबसे अच्छा यह है कि भोजन के बाद गर्म सूप या गुनगुना पानी पिया जाये। एक गिलास गुनगुना पानी सोने से ठीक पहले अभी पीना चाहिए। इससे खून के थक्के नहीं बनेंगे और आप हृदयाघात से बचे रहेंगे।
एक हृदय रोग विशेषज्ञ का कहना है कि यदि इस संदेश को पढ़ने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसे १० लोगों को भेज दे, तो वह कम से कम एक जान बचा सकता है।
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📓📖 Good Thinking 🌹🌺 सुविचार 📖📓

दुनिया में किसी भी व्यक्ति को भ्रम में नहीं रहना चाहिए, बिना गुरु के कोई भी दुसरे किनारे तक नहीं जा सकता है !!

अवश्य देखिए मंगल प्रवचन !!!
*”साधना-चैनल”* पर प्रतिदिन सायं 07:40 से 08:40 तक
*”खबर Fast News”* पर प्रतिदिन रात्रि 09:30 से 10:30 तक
*”STV HARYANA News”* पर प्रतिदिन सुबह 06:00 से 07:00 बजे तक
एवं पढ़िए पुस्तक *”ज्ञान गंगा”*
इस *ज्ञान गंगा* व गीता तेरा ज्ञान अमृत पुस्तक को *निःशुल्क* प्राप्त करने हेतु हमें अपना नाम व पता निम्न नं. पर *SMS* करें…
sms to- 7027000825,7027000826,7027000827

तुम्हें भूलकर भी न भूल पायेगें हम!
बस यही एक वादा निभा पायेगें हम!!
मिटा देंगे खुद को भी जहाँ से लेकिन!!!
तेरा नाम दिल से न मिटा पायेगें हम!!!!
सत् साहेब… 

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सत् साहेब… 

दिपावली

बहुजनों को दीपावली क्यों नहीं मनानी चाहिए

असुर परंपरा में दीपावली की शुरुआत को पुराणों में वर्णित एक कथा से जोड़ा जाता है। ऐसी मान्यता है कि राजा बलि या बलिराजा, जोकि एक अत्यंत शक्तिशाली व प्रजापालक असुर सम्राट थे, का संपूर्ण पृथ्वी पर शासन था। सुरासुर संग्राम में बलिराजा ने सुरों को पराजित कर दिया
उत्तर भारत में मुख्यतः दो प्रकार की परंपराएं या संस्कृतियां प्रचलित हैं। पहली है सुर (देव)/ब्राहणवादी/द्विज/आर्य इत्यादि परंपरा। दूसरी को असुर/अनार्य/राक्षस/दैत्य इत्यादि परंपराएं कहा जाता है।
वैसे तो उत्तर भारत में कई परंपराएं, रीति-रिवाज और संस्कृतियां प्रचलित हैं परंतु विश्लेषण की सुविधा के लिए इन्हें ऊपर बताए गए दो मुख्य वर्गों में बांटा गया है। हम सुर व असुर या देवासुर शब्दों का इस्तेमाल करेंगे। सुर और असुर शब्दों का अर्थ समय के साथ बदलता रहा है- वैदिक व परवैदिक काल में व विशेषकर उस काल में जब पुराण लिखे गए। पौराणिक काल के बाद से असुर शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जाने लगा।
दीपावली सुर परंपरा का हिस्सा है और इसे मनाने के कई कारण बताए जाते हैं। पहला-और यह सबसे लोकप्रिय है-यह कि दीपावली, भगवान राम की असुर रावण पर विजय के बाद उनके वनवास से अयोध्या लौटने के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। उनकी घर वापसी पर दीप जलाकर खुशियां मनाई जाती हैं। इस त्योहार का नाम दीपावली इसलिए पड़ा क्योंकि उनके विजयी सम्राट राम के आगमन पर अयोध्यावासियों ने दीपों की अवली (पंक्ति) जलाई थी। दीपावली से संबंधित दूसरे मिथक का वर्णन महाभारत में है। ऐसा कहा जाता है कि वनवास से पांडवों के हस्तिनापुर लौटने पर नगरवासियों ने मिट्टी के दीप जलाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी। एक तीसरा मिथक यह भी है कि देवासुर संग्राम के दौरान हुए समुद्र-्रमंथन में देवी लक्ष्मी अवतरित हुईं और भगवान विष्णु ने उसी रात उनसे विवाह कर लिया। प्रसन्नता के इस अवसर को मनाने के लिए दीपों की पंक्तियां प्रज्जवलित की गईं।
असुर परंपरा में दीपावली की शुरुआत को पुराणों में वर्णित एक कथा से जोड़ा जाता है। ऐसी मान्यता है कि राजा बलि या बलिराजा, जोकि एक अत्यंत शक्तिशाली व प्रजापालक असुर सम्राट थे, का संपूर्ण पृथ्वी पर शासन था। सुरासुर संग्राम में बलिराजा ने सुरों को पराजित कर दिया। इसके बाद, सुरों ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। भगवान विष्णु वामन अवतार में बलि राजा के पास पहुंचे और उनसे दान की याचना की। उदार ह्दय बलि राजा ने अपना संपूर्ण राज्य और धन-संपत्ति भगवान विष्णु को दान कर दी और उनकी इस उदारता का उन्हें यह पुरस्कार मिला कि उन्हें पाताललोक में निष्कासित कर दिया गया। ऐसा माना जाता है कि दीपावली, असुर राजा पर सुरों की इस विजय के उपलक्ष्य में मनाई जाती है।
एक अन्य कथा कहती है कि असुरों के साथ युद्ध में सुर हार गए। इसके बाद, काली देवी ने दुर्गा देवी के मस्तक से प्रकट होकर, असुरों का संहार किया। इस विजय का उत्सव, कालीपूजा के रूप में मनाया जाता है, जिसका आयोजन दीपावली के आसपास, देश के कई भागों में होता है।
यह महत्वपूर्ण है कि सुर या ब्राह्मणवादी संस्कृति में प्रचलित सभी कथाओं के अनुसार, दीपावली असुरों पर सुरों का विजयोत्सव है। इसलिए असुरों-जो आज के बहुजन हैं-को दीपावली कतई नहीं मनानी चाहिए। विडंबना यह है कि समकालीन भारत में ब्राह्मणवादी दीपावली को असुर मूल के लोग तो मना ही रहे हैं, कुछ गैर-हिन्दू भी मना रहे हैं।
सच तो यह है कि असुर परंपरा को ‘वृहद परंपरा व सुर परंपरा को ‘लघु परंपरा माना जाना चाहिए, हालांकि शिकागो विश्वविद्यालय के मानवशास्त्री मैंकिम मेरियट ने इसके विरुद्ध मत व्यक्त किया है। ब्राह्मणवादी हिन्दू समाज की तथाकथित मुख्यधारा की परंपरा में, असुर परंपरा का नकारात्मक चित्रण किया गया है। अब समय आ गया है कि प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समतावादी भारतीय समाज ब्राह्मणवादी  दीपावली की परंपरा को सिरे से खारिज करे।
-जैसा कि उन्होंने फारवर्ड प्रेस के लखनऊ संवाददाता अनुराग भास्कर को बताया।
 (फारवर्ड प्रेस, नवम्बर, 2013 अंक में प्रकाशित )